उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में आगामी पंचायत चुनावों को लेकर हलचल तेज हो गई है। राज्य सरकार द्वारा जल्द ही घोषित होने वाले प्रधान चुनावों के मद्देनजर गांवों में उम्मीदवारों का आना-जाना शुरू हो चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक गतिविधियां चरम पर पहुंच रही हैं, जहां पार्टियां और स्वतंत्र उम्मीदवार अपनी-अपनी रणनीतियां बना रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के गांवों में प्रधान चुनाव की तैयारी तेज, उम्मीदवारों की हलचल शुरू
लखनऊ, 16 सितंबर 2025: उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में आगामी पंचायत चुनावों को लेकर हलचल तेज हो गई है। राज्य सरकार द्वारा जल्द ही घोषित होने वाले प्रधान चुनावों के मद्देनजर गांवों में उम्मीदवारों का आना-जाना शुरू हो चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक गतिविधियां चरम पर पहुंच रही हैं, जहां पार्टियां और स्वतंत्र उम्मीदवार अपनी-अपनी रणनीतियां बना रहे हैं। यह चुनाव न केवल स्थानीय स्तर पर विकास के मुद्दों को प्रभावित करेगा, बल्कि राज्य की ग्रामीण राजनीति को भी नई दिशा देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार चुनावों में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी, जो ग्रामीण भारत के भविष्य को आकार देगी।
चुनावी माहौल गर्माया: गांवों में सभाओं का दौर शुरू
उत्तर प्रदेश के सैकड़ों गांवों में इन दिनों चुनावी माहौल जोरों पर है। लखनऊ से लेकर पूर्वांचल, बुंदेलखंड और रोहिलखंड के कोने-कोने तक उम्मीदवार घर-घर जाकर समर्थन जुटाने में जुटे हैं। ग्रामीणों के बीच चर्चा का केंद्र बिंदु बन चुके हैं सड़कें, पानी, बिजली और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दे। कई गांवों में प्रार्थना सभाओं और सामुदायिक बैठकों का आयोजन हो रहा है, जहां उम्मीदवार अपनी योजनाओं को पेश कर रहे हैं।
उदाहरण के लिए, लखीमपुर खीरी जिले के एक छोटे से गांव में स्थानीय भाजपा नेता राम सिंह ने बताया, “हमारी पार्टी ग्रामीण विकास पर फोकस कर रही है। प्रधान चुनाव में हमारी उम्मीदवार महिलाओं को प्राथमिकता देंगे, ताकि पंचायती राज व्यवस्था में लैंगिक समानता आए।” इसी तरह, समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता भी सक्रिय हैं। वे कहते हैं कि पिछली सरकारों की योजनाओं को मजबूत करने का वादा कर रहे हैं।
चुनाव आयोग की ओर से अभी आधिकारिक तारीख घोषित नहीं हुई है, लेकिन अनुमान है कि अक्टूबर-नवंबर में मतदान होगा। इसकी तैयारी में प्रशासन भी जुटा है। जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि गांवों में मतदाता सूची का विशेष सत्यापन हो। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल माध्यमों का भी इस्तेमाल बढ़ रहा है। व्हाट्सएप ग्रुप्स और फेसबुक पेजों के जरिए उम्मीदवार अपनी पहुंच बढ़ा रहे हैं। हालांकि, कई बुजुर्ग ग्रामीण अभी भी पारंपरिक तरीकों पर भरोसा करते हैं, जैसे चाय की दुकानों पर गपशप।
इस चुनावी दौर में गांवों की सड़कें गुलजार हैं। उम्मीदवारों के वाहनों का आवागमन बढ़ गया है। कुछ जगहों पर छोटे-मोटे विवाद भी सामने आ रहे हैं, लेकिन ज्यादातर इलाकों में शांतिपूर्ण माहौल है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह हलचल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी गति देगी, क्योंकि चुनावी खर्च से स्थानीय दुकानदारों को फायदा होगा।
उम्मीदवारों की रणनीतियां: पार्टियां और स्वतंत्र दावेदार
प्रधान चुनावों में उम्मीदवारों की रणनीतियां बदल रही हैं। पारंपरिक रूप से बहुजन समाज पार्टी (बसपा), भाजपा, सपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां हावी रही हैं, लेकिन इस बार स्वतंत्र उम्मीदवारों की संख्या बढ़ सकती है। कई युवा, जो सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर चुके हैं। वे कहते हैं कि पार्टियां भ्रष्टाचार की जड़ हैं, इसलिए वे स्वतंत्र होकर काम करेंगे।
एक सर्वे के अनुसार, लगभग 40 प्रतिशत उम्मीदवार महिलाएं होंगी, जो 50 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान का फायदा उठा रही हैं। ललितपुर जिले की एक महिला उम्मीदवार मीरा देवी ने कहा, “मैं गांव में स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र को मजबूत बनाना चाहती हूं। महिलाओं की भागीदारी से ही ग्रामीण विकास संभव है।” उनकी रणनीति है कि घर-घर जाकर महिलाओं से सीधा संवाद करें।
पार्टियों की ओर से ट्रेनिंग कैंप लगाए जा रहे हैं। भाजपा ने अपनी महिला इकाई को निर्देश दिया है कि वे गांवों में जागरूकता अभियान चलाएं। सपा ने पिछड़े वर्गों पर फोकस किया है, जबकि बसपा दलित समुदाय को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। स्वतंत्र उम्मीदवारों में कई ऐसे हैं जो एनजीओ से जुड़े हैं और पर्यावरण, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर जोर दे रहे हैं।
चुनावी खर्च पर भी नजर है। चुनाव आयोग ने सीमा तय की है, लेकिन उम्मीदवार चुपके से प्रचार कर रहे हैं। कुछ जगहों पर पोस्टर-बैनर का खर्चा हजारों में पहुंच रहा है। राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अजय कुमार कहते हैं, “इस बार डिजिटल कैंपेनिंग बढ़ेगी, जो ग्रामीण युवाओं को आकर्षित करेगी। लेकिन पारंपरिक वोट बैंक अभी भी महत्वपूर्ण हैं।”
ग्रामीणों की उम्मीदें: विकास के सपने
ग्रामीणों के बीच उम्मीदें कायम हैं। वे चाहते हैं कि प्रधान चुनाव के बाद गांवों में सड़कें बेहतर हों, पानी की समस्या हल हो और बिजली की आपूर्ति नियमित हो। एक किसान नेता ने बताया, “हमारी फसलें बर्बाद हो रही हैं क्योंकि सिंचाई की व्यवस्था ठीक नहीं। नया प्रधान इस पर काम करे।” शिक्षा और स्वास्थ्य भी प्रमुख मुद्दे हैं। कई गांवों में स्कूलों में शिक्षक कम हैं, और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र दूर हैं।
महिलाओं की स्थिति सुधारने पर भी जोर है। ग्रामीण महिलाएं कह रही हैं कि सशक्तिकरण योजनाओं को लागू करने वाले प्रधान की जरूरत है। युवा मतदाता रोजगार पर फोकस चाहते हैं। एमएनआरईजीए जैसी योजनाओं को मजबूत बनाने की मांग है। एक सर्वे में पाया गया कि 60 प्रतिशत ग्रामीण विकास कार्यों को प्राथमिकता देंगे।
चुनाव के बाद पंचायतें विकास के केंद्र बनेंगी। केंद्र सरकार की योजनाएं जैसे पीएम आवास और स्वच्छ भारत अब गांव स्तर पर लागू होंगी। ग्रामीणों का मानना है कि सही उम्मीदवार चुनने से ही ये सपने साकार होंगे। हालांकि, जातिवाद और धनबल अभी भी चुनौती हैं।
चुनौतियां और मुद्दे: चुनावी प्रक्रिया में बाधाएं
प्रधान चुनावों में कई चुनौतियां हैं। सबसे बड़ा मुद्दा है जातिगत समीकरण। उत्तर प्रदेश में जाति आधारित वोटिंग आम है, जो उम्मीदवारों को प्रभावित करती है। इसके अलावा, महिलाओं के लिए आरक्षण होने के बावजूद पति या परिवार के सदस्य प्रचार करते हैं, जिसे ‘प्रॉक्सी’ कहा जाता है। चुनाव आयोग इस पर नजर रख रहा है।
पर्यावरणीय मुद्दे भी उभर रहे हैं। कई गांवों में जल संकट गहरा रहा है, और उम्मीदवारों को इसके समाधान पर बोलना पड़ रहा है। कोविड के बाद स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी चर्चा में है। मतदाता जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि फर्जी वोटिंग न हो।
प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां जोरों पर हैं। पुलिस बल तैनात किया जा रहा है, और सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि निष्पक्ष चुनाव ही ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत बनाएगा। यदि ये चुनाव शांतिपूर्ण हुए, तो यह राज्य के लिए सकारात्मक संकेत होगा।
भविष्य की दिशा: ग्रामीण राजनीति में बदलाव
आगामी प्रधान चुनाव उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति को नया मोड़ देंगे। युवाओं और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से नई ऊर्जा आएगी। डिजिटल इंडिया के तहत पंचायतों को ई-गवर्नेंस से जोड़ा जाएगा। उम्मीद है कि ये चुनाव विकास के नए युग की शुरुआत करेंगे।
ग्रामीणों का उत्साह देखकर लगता है कि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हो रही हैं। उम्मीदवारों की हलचल से गांव जीवंत हो गए हैं। अब बाकी है तो निष्पक्ष प्रक्रिया, जो सबके सपनों को साकार करे।