काशी की आत्मा पर चोट: फ्लाईओवर के लिए रुकी ऐतिहासिक रामलीला, कलाकारों का जोरदार विरोध

काशी की रामलीला

काशी की आत्मा पर चोट: फ्लाईओवर के लिए रुकी ऐतिहासिक रामलीला, कलाकारों का जोरदार विरोध

वाराणसी, 25 सितंबर 2025: काशी की पवित्र धरती पर जहां हर गली-नुक्कड़ में भक्ति और संस्कृति का संगीत गूंजता है, वहां एक ऐसी परंपरा संकट के कगार पर खड़ी हो गई है जो पिछले 500 वर्षों से चली आ रही है। लाट भैरव रामलीला, जो काशी की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग है, आज विकास के नाम पर बाधित हो रही है। लाट भैरव से सरैया मार्ग पर निर्माणाधीन रेल ओवर ब्रिज (आरओबी) के कारण परंपरागत मार्ग बंद हो जाने से रामलीला का मंचन रुक गया। नाराज कलाकारों, आयोजकों और भक्तों ने बुधवार को सड़क पर उतरकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। बाल कलाकारों सहित राम, लक्ष्मण और सीता के स्वरूपों ने प्रतीकात्मक रूप से प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की, जिससे पूरे इलाके में हलचल मच गई।
यह घटना न केवल सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की चुनौतियों को उजागर करती है, बल्कि विकास और परंपरा के बीच संतुलन की आवश्यकता पर भी सवाल खड़े करती है। रामलीला समिति के सदस्यों का कहना है कि यदि शीघ्र समाधान न निकला तो इस प्राचीन परंपरा का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। आइए, इस मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।

लाट भैरव रामलीला: 500 वर्षों की जीवंत परंपरा

काशी, जिसे वाराणसी के नाम से भी जाना जाता है, हमेशा से ही धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का केंद्र रही है। यहां की लाट भैरव रामलीला की शुरुआत 16वीं शताब्दी में मानी जाती है, जब मुगल काल में भी यह परंपरा निर्बाध रूप से जारी रही। यह रामलीला न केवल रामायण की कथा का मंचन करती है, बल्कि काशी के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का आईना भी है। हर वर्ष नवरात्रि के दौरान लाट भैरव मंदिर से शुरू होकर सरैया तक का यह जुलूस हजारों भक्तों को आकर्षित करता है।
परंपरा के अनुसार, रामलीला का जुलूस लाट भैरव से निकलता है, जहां बाल कलाकार राम, लक्ष्मण और सीता के रूप धारण करते हैं। फिर यह जुलूस शहर की संकरी गलियों से गुजरते हुए सरैया पहुंचता है, जहां मुख्य मंचन होता है। इस दौरान ढोल-नगाड़ों की थाप के साथ भजन-कीर्तन गूंजते हैं, और स्थानीय निवासी अपने घरों के दरवाजे सजाकर स्वागत करते हैं। यह केवल एक नाट्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि काशी की एकजुटता का प्रतीक है।
रामलीला समिति के अध्यक्ष पंडित रामेश्वर तिवारी बताते हैं, “यह रामलीला काशी की आत्मा है। 500 वर्षों से यह हमें राम के आदर्शों से जोड़ती आई है। पिछले साल भी हमने कोविड के बावजूद इसे आयोजित किया था, लेकिन आज विकास के नाम पर इसे कुचलने की कोशिश हो रही है।” इतिहासकारों के अनुसार, यह परंपरा भक्ति आंदोलन के दौर से जुड़ी हुई है, जब तुलसीदास जैसे संतों के प्रभाव से रामकथा का प्रचार हुआ। आजादी के आंदोलन में भी इस रामलीला ने स्वतंत्रता संग्रामियों को प्रेरित किया था।
हालांकि, आधुनिक विकास परियोजनाओं ने इस परंपरा को चुनौती दे दी है। लाट भैरव से सरैया मार्ग पर बन रहा फ्लाईओवर रेलवे ट्रैक के ऊपर से गुजरेगा, जिसका उद्देश्य ट्रैफिक जाम कम करना है। लेकिन निर्माण कार्य के दौरान सड़क पूरी तरह बंद कर दी गई, जिससे जुलूस का मार्ग अवरुद्ध हो गया। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह मार्ग सदियों से उपयोग में है, और वैकल्पिक रास्ते इतने संकरे हैं कि जुलूस के लिए अनुपयुक्त हैं

विरोध प्रदर्शन: सड़क पर उतरे राम-सीता के स्वरूप

बुधवार की शाम को लाट भैरव क्षेत्र में सन्नाटा पसर गया था। जहां हर वर्ष इस समय भक्ति का उद्घोष गूंजता है, वहां आज नारों की गूंज सुनाई दी। रामलीला समिति के बैनर तले सैकड़ों कलाकार, आयोजक और भक्त सड़क पर उतर आए। सबसे मार्मिक दृश्य तब आया जब 10 वर्षीय बाल कलाकार अक्षय (राम के भूमिका में), 9 वर्षीय आर्यन (लक्ष्मण) और 8 वर्षीय प्रिया (सीता) ने अपने पारंपरिक वेशभूषा में प्रशासन के खिलाफ विरोध जताया। उनके हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर लिखा था – “रामलीला बचाओ, परंपरा बचाओ”।
प्रदर्शनकारी “जय सिया राम” के नारों के साथ आगे बढ़े, लेकिन पुलिस बैरिकेडिंग के कारण रुक गए। समिति के सचिव गोविंद शर्मा ने कहा, “हमने प्रशासन से कई बार अपील की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। मुहर्रम के लिए तो रास्ता खोला गया, लेकिन हमारी रामलीला के लिए क्यों नहीं? यह धार्मिक भेदभाव जैसा लगता है।” प्रदर्शन के दौरान कुछ उत्साही युवाओं ने फ्लाईओवर निर्माण स्थल पर पहुंचकर काम रोकने की कोशिश की, लेकिन सुरक्षा बलों ने उन्हें पीछे धकेल दिया।
स्थानीय विधायक अनुराग सिंह, जो बाद में घटनास्थल पर पहुंचे, ने कहा, “यह काशी की सांस्कृतिक धरोहर है। मैं मुख्यमंत्री से बात करूंगा ताकि वैकल्पिक व्यवस्था हो सके।” प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा, लेकिन इसने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया। #SaveLaatBhairavRamleela हैशटैग ट्रेंड करने लगा, और हजारों यूजर्स ने अपनी प्रतिक्रियाएं दर्ज कीं। एक ट्विटर यूजर ने लिखा, “काशी में रामलीला रुक गई, लेकिन विकास कहां है? यह तो परंपरा का अपमान है।”

प्रशासन का रुख: विकास बनाम परंपरा का द्वंद्व

वाराणसी विकास प्राधिकरण (वीडीए) के अधिकारियों का कहना है कि फ्लाईओवर का निर्माण रेल मंत्रालय के निर्देश पर हो रहा है, और समय सीमा सख्त है। एक वरिष्ठ इंजीनियर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “रास्ता अस्थायी रूप से बंद है। हमने वैकल्पिक मार्ग सुझाए हैं, लेकिन समिति ने सहयोग नहीं किया। निर्माण पूरा होते ही सब सामान्य हो जाएगा।” हालांकि, समिति का आरोप है कि प्रस्तावित वैकल्पिक रास्ता जुलूस के लिए सुरक्षित नहीं है, क्योंकि वहां बिजली के तार और निर्माण सामग्री बिखरी पड़ी है।
पुलिस प्रशासन ने प्रदर्शन को नियंत्रित रखा। प्रशासन ने कहा, “हम शांति बनाए रखेंगे। दोनों पक्षों से बातचीत जारी है।” लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय सांस्कृतिक संवेदनशीलता पर विचार किया जाता है? काशी विश्वनाथ कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं ने भी कई मंदिरों को प्रभावित किया था, लेकिन तब न्यायिक हस्तक्षेप से समाधान निकला। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (EIA) में सांस्कृतिक प्रभाव का आकलन भी शामिल होना चाहिए।
राष्ट्रीय सांस्कृतिक निधि के एक अधिकारी ने टिप्पणी की, “ऐसी परंपराओं को संरक्षित करने के लिए केंद्र सरकार सब्सिडी देती है। स्थानीय प्रशासन को संवाद बढ़ाना चाहिए।” इस घटना ने पूरे उत्तर प्रदेश में बहस छेड़ दी है। लखनऊ से लखनऊ के सांस्कृतिक मंत्रालय ने भी संज्ञान लिया है, और जल्द ही एक टीम वाराणसी भेजने की योजना है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: काशी की रामलीला परंपरा का सफर

लाट भैरव रामलीला की जड़ें गहरी हैं। 1526 में बाबर के आक्रमण के बाद भी काशी में रामभक्ति जीवित रही। इतिहासकार डॉ. रवींद्र पांडे के अनुसार, “यह रामलीला अवध शैली की है, जिसमें संगीत और नृत्य का मिश्रण है। 1857 के विद्रोह में इसे गुप्त संदेशवाहक के रूप में इस्तेमाल किया गया।” 20वीं शताब्दी में स्वामी विवेकानंद ने भी इसकी प्रशंसा की थी।
आज यह परंपरा 200 से अधिक कलाकारों पर निर्भर है, जिनमें से अधिकांश स्थानीय निवासी हैं। महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी है, हालांकि सीता की भूमिका अभी भी बाल कलाकार निभाते हैं। महामारी के दौरान ऑनलाइन मंचन ने इसे जीवित रखा, लेकिन भौतिक जुलूस की कमी ने भक्तों को दुखी किया। अब फ्लाईओवर विवाद ने फिर से चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

भविष्य की राह: संवाद और समाधान की जरूरत

यह संकट केवल लाट भैरव तक सीमित नहीं है। काशी में कई अन्य रामलीलाएं भी इसी मार्ग से गुजरती हैं, जैसे नक्कटैया रामलीला जो 482 वर्ष पुरानी है। यदि शीघ्र समाधान न निकला तो नवरात्रि का पूरा आयोजन प्रभावित हो सकता है। समिति ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा है, जिसमें रास्ता खोलने या वैकल्पिक मार्ग को सुरक्षित बनाने की मांग की गई है।
सामाजिक कार्यकर्ता मीरा देवी कहती हैं, “विकास जरूरी है, लेकिन संस्कृति को कुर्बान नहीं किया जा सकता। प्रशासन को दोनों को जोड़ना होगा।” विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि डिजिटल मैपिंग से सांस्कृतिक मार्गों को चिह्नित किया जाए। केंद्र सरकार की ‘सांस्कृतिक हेरिटेज’ योजना के तहत फंडिंग भी उपलब्ध है।
अंत में, यह घटना हमें याद दिलाती है कि काशी केवल मंदिरों का शहर नहीं, बल्कि जीवंत परंपराओं का संगम है। यदि समय रहते हस्तक्षेप हुआ तो यह संकट अवसर बन सकता है – जहां विकास और विरासत साथ-साथ फलें-फूलें। भक्तों की आशा है कि राम की कृपा से सब ठीक हो जाएगा। जय सिया राम!

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