वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच तनाव की ठंडी हवाओं के बाद अब गर्मजोशी की लहर दिखाई दे रही है। अगस्त 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर थोपे गए 50% टैरिफ ने व्यापारिक रिश्तों में भूचाल ला दिया था, लेकिन सितंबर 2025 में शुरू हुई नई बातचीत ने उम्मीद की किरण जगा दी है।
धमाकेदार खबर: भारत-अमेरिका रिश्ते फिर से पटरी पर, टैरिफ का तूफान होगा शांत?
वाशिंगटन और नई दिल्ली के बीच संबंधों में हाल के दिनों में आई ठंडक अब गर्मजोशी की ओर मुड़ने के संकेत दे रही है। अगस्त 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के बाद दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव चरम पर पहुंच गया था। लेकिन सितंबर 2025 में बातचीत के पुनरारंभ के साथ ही उम्मीदें जगी हैं कि ये संबंध पटरी पर लौट सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ हटाए जाते हैं, तो व्यापारिक सौदा जल्दी हो सकता है। इस लेख में हम इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जहां द्विपक्षीय व्यापार के महत्व को ध्यान में रखते हुए टैरिफ विवाद का समाधान कैसे संभव है, यह जानेंगे।
टैरिफ विवाद की पृष्ठभूमि
अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक संबंध हमेशा से जटिल रहे हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन के दूसरे कार्यकाल में यह विवाद और गहरा हो गया। अगस्त 2025 में अमेरिका ने भारत से आयातित वस्तुओं पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिए, जिसमें 25 प्रतिशत का अतिरिक्त जुर्माना भारत के रूसी तेल खरीद के कारण था। ट्रंप ने इसे “एकतरफा आपदा” करार दिया, दावा करते हुए कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर औसतन 6.2 प्रतिशत टैरिफ लगाता है, जबकि अमेरिका का रुख अधिक उदार रहा है। इस कदम से भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा, खासकर वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स और आईटी हार्डवेयर जैसे क्षेत्रों में।
विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में भारत-अमेरिका व्यापार 190 बिलियन डॉलर से अधिक का था, जिसमें भारत का निर्यात 80 बिलियन डॉलर का था। लेकिन टैरिफ के बाद अगस्त 2025 में भारतीय निर्यात में वृद्धि हुई, क्योंकि कंपनियों ने शिपमेंट को आगे बढ़ा लिया था। फिर भी, लंबे समय में यह टैरिफ भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। ट्रंप का यह फैसला रूस-यूक्रेन संघर्ष से जुड़ा था, जहां भारत ने रूसी तेल सस्ते दामों पर खरीदा, जिसे अमेरिका ने अपनी ऊर्जा नीति के खिलाफ माना।
इस विवाद ने न केवल व्यापार को प्रभावित किया, बल्कि दोनों देशों के सामरिक साझेदारी पर भी सवाल उठाए। क्वाड (क्वाड्रिलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग) और इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार है, लेकिन टैरिफ ने इस रिश्ते को “निम्नतम बिंदु” पर पहुंचा दिया। ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की एक रिपोर्ट में कहा गया कि यह कदम भारत को यूरोप की ओर झुकाव लेने के लिए प्रेरित कर सकता है।
हालिया विकास: बातचीत का पुनरारंभ
सितंबर 2025 में एक सकारात्मक मोड़ आया जब भारत और अमेरिका ने व्यापार वार्ता फिर से शुरू की। 16 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित पहली आमने-सामने की बैठक अमेरिकी सहायक व्यापार प्रतिनिधि ब्रेंडन लिंच और भारतीय विशेष सचिव राजेश अग्रवाल के नेतृत्व में हुई। दोनों पक्षों ने इसे “सकारात्मक और आगे बढ़ने वाला” बताया। साप्ताहिक वर्चुअल चर्चाओं के बाद यह बैठक महत्वपूर्ण थी, खासकर जब अगस्त में टैरिफ के कारण छठी दौर की वार्ता स्थगित हो गई थी।
भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार के महत्व पर जोर दिया और जल्द से जल्द एक पारस्परिक लाभकारी व्यापार समझौते (बीटीए) के लिए प्रयास तेज करने का फैसला किया। अमेरिकी पक्ष ने भारत के प्रति नरम रुख अपनाया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संबंधों को मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह बैठक टैरिफ तनाव के बीच एक रीसेट की उम्मीद जगाती है।
इसके अलावा, ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने कहा कि “भारत मेज पर आ रहा है,” जो वार्ता में प्रगति का संकेत देता है। हालांकि, बैठक में ऊंचे टैरिफ संरचना से उत्पन्न चुनौतियों पर भी चर्चा हुई, जो निर्यातकों के लिए बाधा बने हुए हैं।
क्या कम होंगे टैरिफ?
टैरिफ विवाद का समाधान दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि प्रगति के लिए अमेरिका को अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ हटाने होंगे। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि रूसी तेल से जुड़े इस जुर्माने के बिना सौदा मुश्किल है। जीटीआरआई ने सलाह दी कि भारत को कृषि और डेयरी क्षेत्रों में अमेरिकी मांगों पर सख्त रुख अपनाना चाहिए, क्योंकि ये क्षेत्र लाखों किसानों की आजीविका से जुड़े हैं।
अमेरिकी पक्ष का मानना है कि टैरिफ भारत को बाजार खोलने के लिए दबाव डालने का साधन हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका असर गहरा है। यदि टैरिफ कम होते हैं, तो भारतीय निर्यात 10-15 प्रतिशत बढ़ सकता है, खासकर फार्मा और टेक्सटाइल में। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया कि सौदे की पहली चरण नवंबर 2025 तक पूरा हो सकता है, लेकिन अमेरिकी लचीलापन जरूरी है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि ट्रंप प्रशासन रूस से जुड़े मुद्दे पर नरमी बरतता है, तो टैरिफ का झंझट कम हो सकता है, जिससे संबंध मजबूत होंगे।
हालांकि, कुछ विश्लेषक चिंतित हैं कि ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति से टैरिफ लंबे समय तक बने रह सकते हैं। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (सीएफआर) की रिपोर्ट में कहा गया कि यह महत्वपूर्ण साझेदारी को प्रभावित कर सकता है। फिर भी, हालिया बैठकें सकारात्मक हैं, जो टैरिफ में कमी की संभावना दर्शाती हैं।
द्विपक्षीय व्यापार का महत्व
अमेरिका और भारत का व्यापार न केवल आर्थिक, बल्कि सामरिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। 2024 में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य था, जहां आईटी सेवाएं, ज्वेलरी और इंजीनियरिंग गुड्स प्रमुख थे। टैरिफ के बावजूद, दोनों देश ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी में सहयोग बढ़ा रहे हैं। उदाहरण के लिए, भारत-अमेरिका आईटीईसी (इंटरनेशनल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन) समझौता हाल ही में मजबूत हुआ।
टैरिफ कम होने से भारतीय एमएसएमई को फायदा होगा, जो कुल निर्यात का 45 प्रतिशत हैं। इसके अलावा, कृषि क्षेत्र में अमेरिकी मांगें जैसे डेयरी उत्पादों का बाजार खोलना भारत के लिए संवेदनशील है, लेकिन संतुलित सौदा दोनों को लाभ पहुंचा सकता है। लिवमिंट की रिपोर्ट के अनुसार, एक अंतरिम सौदा से व्यापार 200 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का मत विभाजित है। जीटीआरआई के अनुसार, भारत को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में अमicus क्यूरी ब्रिफ दाखिल कर टैरिफ को चुनौती देनी चाहिए, जो अमेरिकी व्यवसायों के हित में भी होगा। वहीं, यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (ईसीएफआर) का कहना है कि भारत को यूरोप पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, ट्रंप की नीतियों के बीच हेजिंग के रूप में।
ट्रंप के पूर्व सलाहकारों का मानना है कि भारत बाजार खोलेगा तो टैरिफ हटेंगे। लेकिन भारतीय अर्थशास्त्री जैसे अरुण कुमार कहते हैं कि यह भारत की संप्रभुता से समझौता होगा। कुल मिलाकर, विशेषज्ञ आशावादी हैं कि बातचीत से समाधान निकलेगा।
भविष्य की संभावनाएं
भविष्य में, यदि टैरिफ कम होते हैं, तो अमेरिका-भारत संबंध नई ऊंचाइयों को छू सकते हैं। नवंबर 2025 तक बीटीए का पहला चरण पूरा होने की उम्मीद है, जो रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग को बढ़ावा देगा। भारत की “मेक इन इंडिया” पहल अमेरिकी निवेश को आकर्षित कर सकती है। हालांकि, वैश्विक तनाव जैसे यूक्रेन युद्ध से प्रभावित हो सकता है।
कुल मिलाकर, संबंध पटरी पर लौटने लगे हैं, लेकिन टैरिफ का झंझट कम करने के लिए दोनों पक्षों को लचीलापन दिखाना होगा।