बड़ी खबर: सुप्रीम कोर्ट का वक्फ कानून पर सनसनीखेज फैसला: कुछ नियमों पर रोक, क्या बदलेगी तस्वीर?”

सुप्रीम कोर्ट का वक्फ कानून को लेकर फैसला

बड़ी खबर: सुप्रीम कोर्ट का वक्फ कानून पर सनसनीखेज फैसला: कुछ नियमों पर रोक, क्या बदलेगी तस्वीर?”

नई दिल्ली, 15 सितंबर 2025 सुप्रीम कोर्ट ने आज वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस कानून के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाई, जबकि पूरे अधिनियम को निलंबित करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी कानून की संवैधानिकता का प्रारंभिक अनुमान उसके पक्ष में होता है और केवल “दुर्लभतम परिस्थितियों” में ही पूरे कानून पर रोक लगाई जा सकती है। इस फैसले ने केंद्र सरकार, मुस्लिम समुदाय और अन्य हितधारकों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है, जिससे यह मामला देश भर में चर्चा का विषय बन गया है।

पृष्ठभूमि: वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025

वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 को केंद्र सरकार ने 8 अप्रैल 2025 को अधिसूचित किया था, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे मंजूरी दी। यह विधेयक लोकसभा में 3 अप्रैल को 288-232 वोटों से और राज्यसभा में 4 अप्रैल को पारित हुआ था। इस कानून का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन, पारदर्शिता और दक्षता में सुधार करना था। हालांकि, इसके कुछ प्रावधानों को लेकर मुस्लिम संगठनों, विपक्षी दलों और अन्य समूहों ने आपत्तियां दर्ज कीं। इन संगठनों ने इसे मुस्लिम समुदाय के धार्मिक और संपत्ति अधिकारों पर हस्तक्षेप करने वाला बताया, जबकि कुछ गैर-मुस्लिम याचिकाकर्ताओं ने इसे भेदभावपूर्ण करार दिया।

सुप्रीम कोर्ट में इस अधिनियम के खिलाफ 100 से अधिक याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें धारा 3(आर), 2(सी), 3(सी), 23 और अन्य प्रावधानों की संवैधानिकता पर सवाल उठाए गए। कोर्ट ने 22 मई 2025 को तीन दिन की मैराथन सुनवाई के बाद इस मामले में अपना अंतरिम आदेश सुरक्षित रखा था। आज, 15 सितंबर 2025 को, कोर्ट ने इस पर अपना फैसला सुनाया।

कोर्ट द्वारा रोके गए प्रमुख प्रावधान

सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 के निम्नलिखित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई:

पांच साल तक इस्लाम का पालन करने की शर्त (धारा 3(आर)): इस प्रावधान में कहा गया था कि वक्फ बोर्ड का सदस्य बनने या वक्फ संपत्ति बनाने के लिए व्यक्ति को कम से कम पांच साल तक इस्लाम का अनुयायी होना चाहिए। कोर्ट ने इसे मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के खिलाफ माना। कोर्ट ने कहा कि जब तक इस संबंध में स्पष्ट नियम नहीं बनाए जाते, यह शर्त लागू नहीं होगी।

जिला कलेक्टर की शक्तियां (धारा 2(सी)): इस धारा में जिला कलेक्टर को यह तय करने का अधिकार दिया गया था कि क्या कोई वक्फ संपत्ति सरकारी भूमि पर अतिक्रमण है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन माना। कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के संपत्ति अधिकारों का निर्धारण कार्यपालिका नहीं, बल्कि न्यायपालिका या वक्फ ट्रिब्यूनल द्वारा किया जाना चाहिए। इस प्रावधान पर भी अंतिम सुनवाई तक रोक लगाई गई।

राजस्व रिकॉर्ड से संबंधित प्रावधान (धारा 3(74)): कोर्ट ने राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव से संबंधित प्रावधानों पर भी रोक लगाई। यह निर्देश दिया गया कि जब तक वक्फ ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट द्वारा संपत्ति के मालिकाना हक का अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक न तो वक्फ को उसकी संपत्ति से बेदखल किया जाएगा और न ही राजस्व रिकॉर्ड में छेड़छाड़ होगी।

वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद की संरचना (धारा 3(सी) और 23): कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि राज्य वक्फ बोर्ड के 11 सदस्यों में अधिकतम तीन और केंद्रीय वक्फ परिषद के 22 सदस्यों में अधिकतम चार गैर-मुस्लिम सदस्य हो सकते हैं। इसके अलावा, कोर्ट ने वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के रूप में गैर-मुस्लिम की नियुक्ति पर पूर्ण रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन यह सुझाव दिया कि जहां तक संभव हो, सीईओ मुस्लिम समुदाय से होना चाहिए।

कोर्ट का रुख: संतुलन और संवैधानिकता

मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने फैसले में कहा, “हमने प्रत्येक धारा को दी गई चुनौती पर प्रथम दृष्टया विचार किया और पाया कि पूरे कानून पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं बनता।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण की व्यवस्था 1923 से चली आ रही है, और इसे पूरी तरह रद्द करने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, विवादित संपत्तियों के मामले में, कोर्ट ने तीसरे पक्ष के अधिकारों को बनाने पर रोक लगा दी, जब तक कि वक्फ ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट का अंतिम फैसला न आ जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पुराने वक्फ अधिनियम की धारा 108A, जो वक्फ कानून को अन्य कानूनों से ऊपर रखती थी, को हटाना गलत नहीं है। साथ ही, जनजातीय भूमियों को संरक्षण देने वाले प्रावधानों पर रोक लगाने से भी इनकार किया गया।

पक्ष और विपक्ष की प्रतिक्रियाएं

इस फैसले को लेकर विभिन्न पक्षों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। मुस्लिम संगठनों, जैसे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB), ने इस अंतरिम आदेश को राहत देने वाला बताया। AIMPLB के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा, “यह फैसला वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को बनाए रखता है।”

कांग्रेस नेता और शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने भी इस फैसले का स्वागत किया, इसे “वक्फ संपत्तियों पर खतरे को टालने वाला” बताते हुए कहा कि यह मुस्लिम समुदाय के लिए एक बड़ी जीत है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार के समर्थकों ने इस बात पर संतोष जताया कि पूरे कानून पर रोक नहीं लगाई गई, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए किए गए सुधारों का रास्ता खुला रहेगा।

हिंदू याचिकाकर्ताओं, जैसे उत्तर प्रदेश की पारुल खेड़ा, ने इस कानून को गैर-मुस्लिमों के प्रति भेदभावपूर्ण बताया था। उनकी याचिका में मांग की गई थी कि वक्फ कानून 1995 और 2025 के तहत जारी अधिसूचनाएं गैर-मुस्लिमों की संपत्तियों पर लागू न हों। हालांकि, कोर्ट ने इस पहलू पर विशेष रूप से कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन गैर-मुस्लिम सदस्यों की संख्या सीमित करने का फैसला उनके हितों को भी ध्यान में रखता है।

केंद्र सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से कोर्ट में दलील दी कि वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 में कोई भेदभावपूर्ण प्रावधान नहीं हैं। मेहता ने कहा कि पांच साल तक इस्लाम का पालन करने की शर्त शरिया कानून के अनुरूप है और 1923 से केवल मुस्लिम ही वक्फ संपत्ति समर्पित कर सकते हैं। केंद्र ने यह भी आश्वासन दिया था कि वक्फ-बाय-यूजर संपत्तियों को डिनोटिफाई नहीं किया जाएगा और न ही वक्फ बोर्डों में कोई नई नियुक्तियां की जाएंगी।

आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अंतिम सुनवाई की तारीख अभी निर्धारित नहीं की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अंतरिम आदेश केवल कुछ प्रावधानों पर लागू होगा, और पूरे कानून की वैधता पर अंतिम फैसला बाद में आएगा। इस बीच, कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि वक्फ संपत्तियों के मालिकाना हक से संबंधित विवादों का निपटारा वक्फ ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट के माध्यम से ही होगा।

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