यूपी में शिक्षकों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: 2 लाख शिक्षकों को देना होगा टीईटी, नौकरी खतरे में!

यूपी मे शिक्षको के लिए अनिवार्य TET

उत्तर प्रदेश में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसने शिक्षक समुदाय में हलचल मचा दी है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करना अनिवार्य होगा।

यूपी में शिक्षकों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: 2 लाख शिक्षकों को देना होगा टीईटी, नौकरी खतरे में!

उत्तर प्रदेश में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसने शिक्षक समुदाय में हलचल मचा दी है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करना अनिवार्य होगा। यह नियम उन शिक्षकों पर भी लागू होगा, जिनकी नियुक्ति शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम 2009 लागू होने से पहले हुई थी। इस फैसले ने उत्तर प्रदेश के लगभग 2 लाख शिक्षकों के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। दूसरी ओर, शिक्षक संगठनों और सरकार ने इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं, जिसने इस मुद्दे को और जटिल बना दिया है। इस लेख में हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले, शिक्षकों की चिंताओं, और सरकार की प्रतिक्रिया पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: टीईटी की अनिवार्यता

1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया कि कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले सभी सरकारी और गैर-सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को दो वर्ष के भीतर टीईटी पास करना होगा। यह आदेश राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा 2011 में निर्धारित न्यूनतम योग्यता के ढांचे और शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 23 पर आधारित है। कोर्ट ने अपने फैसले में शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने और बच्चों के सर्वोत्तम हित को सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच साल से कम समय बचा है, उन्हें टीईटी पास करने की अनिवार्यता से छूट दी जाएगी। हालांकि, यदि ये शिक्षक प्रोन्नति (प्रमोशन) चाहते हैं, तो उन्हें भी टीईटी पास करना होगा। इसके अलावा, जिन शिक्षकों की सेवा अवधि पांच साल से अधिक है, उनके लिए दो वर्ष के भीतर टीईटी पास करना अनिवार्य होगा, अन्यथा उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह नियम अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर तत्काल प्रभाव से लागू नहीं होगा, क्योंकि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी बेंच विचार कर रही है।

इस फैसले ने उन शिक्षकों के लिए चुनौती खड़ी कर दी है, जो वर्षों से बिना टीईटी पास किए पढ़ा रहे हैं। खासकर उन शिक्षकों के लिए, जिनकी नियुक्ति 2009 से पहले हुई थी, जब टीईटी की अनिवार्यता लागू नहीं थी। कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि शिक्षा का स्तर गिर रहा है और योग्य शिक्षकों की आवश्यकता को देखते हुए टीईटी जैसे मानकों से समझौता नहीं किया जा सकता।

शिक्षकों की चिंताएं और विरोध

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने उत्तर प्रदेश के लगभग 2 लाख शिक्षकों के बीच चिंता और असंतोष की लहर पैदा कर दी है। कई शिक्षक संगठनों, जैसे उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ और यूनाइटेड टीचर्स एसोसिएशन, ने इस फैसले को “काला कानून” करार दिया है। उनका कहना है कि यह फैसला उन शिक्षकों के साथ अन्याय है, जो दशकों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं और जिन्होंने अपनी नियुक्ति के समय की सभी योग्यताएं पूरी की थीं।

उदाहरण के लिए, 53 वर्षीय शिक्षक अब्दुल राशिद, जो केवल इंटरमीडिएट पास हैं और जिनके पास बी.एड. या डी.एल.एड. जैसी डिग्री नहीं है, अब टीईटी की न्यूनतम योग्यता (स्नातक और बी.टी.सी.) हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके जैसे हजारों शिक्षकों को दो वर्ष के भीतर स्नातक और टीईटी पास करना एक असंभव चुनौती लग रही है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि 45-55 वर्ष की आयु में इतनी कठिन परीक्षा की तैयारी करना और पास करना मानसिक और आर्थिक तनाव का कारण बन रहा है।

उत्तर प्रदेश में कई शिक्षकों ने इस फैसले के खिलाफ धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। सिद्धार्थनगर, गोंडा, और लखनऊ जैसे शहरों में शिक्षकों ने कलेक्ट्रेट परिसर में प्रदर्शन किए और प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन सौंपे। उनकी मुख्य मांग है कि 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से छूट दी जाए। शिक्षक संगठनों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू करेंगे।

सरकार की प्रतिक्रिया

उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करने की बात कही है, लेकिन साथ ही शिक्षकों के हितों की रक्षा करने का भी आश्वासन दिया है। सरकार के अधिकारियों ने कहा है कि वे उन शिक्षकों के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाश रहे हैं, जो पहले से सेवा में हैं और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता की कमी के कारण टीईटी के लिए आवेदन नहीं कर पा रहे हैं। उदाहरण के लिए, सरकार विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने या पुराने शिक्षकों को प्रशासनिक कार्यों में समायोजित करने जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है।

तमिलनाडु सरकार के उदाहरण का हवाला देते हुए, जहां छह टीईटी परीक्षाएं आयोजित करने की योजना बनाई गई है, उत्तर प्रदेश सरकार भी ऐसी पहल पर विचार कर रही है। शिक्षक संगठनों ने मांग की है कि जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों के माध्यम से विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाए, ताकि शिक्षक टीईटी की तैयारी बेहतर ढंग से कर सकें।

बीजेपी के एमएलसी देवेंद्र प्रताप सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की मांग की है। उन्होंने अपने पत्र में लिखा कि यह फैसला 1.5 लाख शिक्षकों और उनके परिवारों के भविष्य को खतरे में डाल रहा है। उन्होंने सरकार से नया कानून बनाने या मौजूदा नियमों में संशोधन करने का अनुरोध किया है।

शिक्षकों के सामने चुनौतियां

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने कई व्यावहारिक समस्याएं खड़ी कर दी हैं। पहली चुनौती न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता से संबंधित है। टीईटी के लिए स्नातक और बी.टी.सी. अनिवार्य है, लेकिन उत्तर प्रदेश में 50,000 से अधिक शिक्षक ऐसी योग्यता नहीं रखते। उदाहरण के लिए, बी.पी.एड. या डी.पी.एड. धारक शिक्षक, जो शारीरिक शिक्षा के लिए नियुक्त हुए थे, अब टीईटी देने के लिए पात्र नहीं हैं।

दूसरी चुनौती समय की कमी है। दो वर्ष के भीतर स्नातक डिग्री और टीईटी पास करना, खासकर उन शिक्षकों के लिए जो 45-55 वर्ष की आयु में हैं, बेहद कठिन है। इसके अलावा, आर्थिक चिंताएं भी हैं। यदि शिक्षक टीईटी पास नहीं कर पाते और उनकी नौकरी चली जाती है, तो उनके परिवार की आर्थिक स्थिति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

शिक्षक संगठनों की रणनीति

शिक्षक संगठन इस फैसले के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश बी.टी.सी. शिक्षक संघ ने 20 सितंबर तक पांच लाख पत्र पीएमओ को भेजने का अभियान शुरू किया है। इसके अलावा, वे सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की तैयारी कर रहे हैं। संगठनों का कहना है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो वे जंतर-मंतर पर बड़े पैमाने पर धरना देंगे।

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