वाराणसी से मात्र आठ किलोमीटर दूर गंगा और वरुणा नदियों के संगम पर बसा है, बौद्ध धर्म का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यहां ही गौतम बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के बाद अपना प्रथम उपदेश ‘धम्मचक्रप्रवर्तन सूत्र’ दिया था, जिसने बौद्ध धर्म को जन्म दिया। इस ऐतिहासिक घटना ने न केवल आध्यात्मिक जगत को प्रभावित किया, बल्कि विश्व की सांस्कृतिक धरोहर को भी समृद्ध किया। यूनेस्को टीम का आगमन इस स्थल की लंबी प्रतीक्षा को समाप्त करने की उम्मीद जगाता है।
वाराणसी: सारनाथ में यूनेस्को का दौरा: बौद्ध धरोहर की नई उड़ान
वाराणसी, 27 सितंबर 2025 – प्राचीन बौद्ध स्थल सारनाथ में आज यूनेस्को की एक उच्च स्तरीय टीम ने डेरा डाल लिया है। यह टीम भारत सरकार द्वारा 2025-26 साइकिल के तहत नामांकित ‘प्राचीन बौद्ध स्थल, सारनाथ’ की समीक्षा करने के लिए पहुंची है, जो 27 वर्षों से यूनेस्को की अस्थायी सूची में अटकी हुई थी। यह दौरा न केवल सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है, बल्कि उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पटल पर नई ऊंचाइयों तक ले जाने का संकेत भी देता है। स्थानीय प्रशासन और पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (एएसआई) की टीमों के साथ मिलकर यूनेस्को विशेषज्ञ दो दिनों तक स्थल का गहन निरीक्षण करेंगे, जिसमें संरक्षण प्रयास, पर्यावरणीय प्रबंधन और सांस्कृतिक महत्व का मूल्यांकन शामिल होगा।
सारनाथ, जो वाराणसी से मात्र आठ किलोमीटर दूर गंगा और वरुणा नदियों के संगम पर बसा है, बौद्ध धर्म का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यहां ही गौतम बुद्ध ने निर्वाण प्राप्ति के बाद अपना प्रथम उपदेश ‘धम्मचक्रप्रवर्तन सूत्र’ दिया था, जिसने बौद्ध धर्म को जन्म दिया। इस ऐतिहासिक घटना ने न केवल आध्यात्मिक जगत को प्रभावित किया, बल्कि विश्व की सांस्कृतिक धरोहर को भी समृद्ध किया। यूनेस्को टीम का आगमन इस स्थल की लंबी प्रतीक्षा को समाप्त करने की उम्मीद जगाता है। भारत ने इस वर्ष अगस्त में आधिकारिक रूप से सारनाथ को विश्व धरोहर सूची के लिए नामांकित किया था, और अब सितंबर में निर्धारित समीक्षा के तहत यह टीम मौके पर आकलन कर रही है।
यूनेस्को टीम का नेतृत्व कर रही विशेषज्ञ डॉ. मारिया एंजेलिना ने स्थल पर पहुंचते ही धमेख स्तूप का दौरा किया, जो बुद्ध के प्रथम उपदेश का प्रतीक है। यह स्तूप तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का है और सम्राट अशोक द्वारा निर्मित माना जाता है। टीम के सदस्यों ने स्तूप के चारों ओर बने प्राचीन मठों, मूर्तियों और शिलालेखों का अवलोकन किया। एक टीम सदस्य ने कहा, “सारनाथ की संरचनाएं मौर्य से लेकर कुशान, गुप्त और गहड़वाल काल की वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। हम यहां के संरक्षण प्रयासों और सतत पर्यटन की संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।” टीम के साथ एएसआई के अधिकारी भी मौजूद थे, जो पिछले कुछ महीनों से दस्तावेजीकरण और प्रबंधन योजना को मजबूत करने में जुटे हुए हैं
इस दौरे से ठीक पहले एएसआई ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। ब्रिटिश पुरातत्वविदों को श्रेय देने वाली पुरानी पट्टिका को हटाकर एक नई ‘सुधारित’ पट्टिका स्थापित करने की तैयारी की गई है, जो स्थानीय शासक जगत सिंह के परिवार को सारनाथ के संरक्षण का श्रेय देगी। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 18वीं शताब्दी में जगत सिंह ने स्थल पर खुदाई का आदेश दिया था, जिससे प्राचीन अवशेषों का पता चला। यह कदम औपनिवेशिक इतिहास की धारणा को चुनौती देता है और भारतीय योगदान को उजागर करता है। जगत सिंह के वंशज प्रदीप नारायण सिंह ने एएसआई को पत्र लिखकर सांस्कृतिक सूचना बोर्ड में भी बदलाव की मांग की है। यह बदलाव न केवल स्थानीय गौरव को बढ़ाएगा, बल्कि यूनेस्को की समीक्षा में सकारात्मक प्रभाव डालेगा।
सारनाथ का इतिहास बौद्ध धर्म की जड़ों से जुड़ा हुआ है। लगभग 2500 वर्ष पूर्व, बोधगया से पदयात्रा करते हुए बुद्ध अपने पांच शिष्यों से मिलने सारनाथ पहुंचे। यहां उन्होंने चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया, जो बौद्ध दर्शन का मूल आधार है। सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यहां एक स्तंभ स्थापित किया, जिसका सिंह शीर्ष भारत का राष्ट्रीय चिन्ह बन गया। सारनाथ पुरातत्व संग्रहालय, जो एएसआई का पहला साइट संग्रहालय है, में मूल सिंह शीर्ष सहित असंख्य कलाकृतियां संरक्षित हैं। चौखंडी स्तूप, जहां बुद्ध ने शिष्यों से पुनर्मिलन किया, पांचवीं शताब्दी का है और बाद में मुगल काल में इसका विस्तार हुआ। मूलगंध कुटी विहार, जो 1931 में जापानी कलाकार कोसेट्सु नोसु द्वारा बनाया गया, बुद्ध के जीवन की जीवंत भित्तिचित्रों से सजा है।
ये संरचनाएं मात्र पत्थर और ईंटों का संग्रह नहीं हैं; वे शांति, करुणा और ज्ञान की अमर गाथा कहती हैं। बौद्ध तीर्थयात्रियों के लिए सारनाथ चार प्रमुख स्थलों – लुंबिनी (जन्म), बोधगया (निर्वाण), सारनाथ (प्रथम उपदेश) और कुशीनगर (महापरिनिर्वाण) – में से एक महत्वपूर्ण कड़ी है। हर वर्ष लाखों तीर्थयात्री यहां आते हैं, खासकर नेपाल, थाईलैंड, जापान और श्रीलंका से। लेकिन वर्षों से यूनेस्को की अस्थायी सूची में अटके रहने के कारण इसका वैश्विक मान्यता अधूरी रही। 1998 में नामांकन दाखिल किया गया था, लेकिन प्रबंधन योजना की कमी के कारण यह आगे नहीं बढ़ सका। 2019 में संशोधित प्रस्ताव जमा किया गया, और अब 2025-26 साइकिल में अंतिम समीक्षा हो रही है।
I’ve tried a few sites lately but this one really stands out. The interface is smooth and the payouts feel fair. Definitely checking out kayarayaslot more often!
This app is a game changer for me. The interface is so intuitive and the rewards are actually decent. Highly recommend it to my fellow players in the PH. Try phsuperjiliapp
I’ve been trying a few sites lately and this one really stands out. The interface is smooth and the payouts are surprisingly fast. Definitely worth a shot if you like a seamless experience. Check it out at plataforma777win97
Really impressed with the game selection here. Everything loads instantly and the support team is very helpful. I’m sticking with 688wingame from now on.
The graphics and sounds make the whole experience so immersive. It feels like a real casino right in my room. Love richjili777!